उत्तराखण्ड में भूकंप और बारिश ने बढ़ाया भूस्खलन का खतरा, ये रहे कारण

👇खबरें सुनने के लिए यहां क्लिक करें।


Uttarakhand Landslides- उत्तराखण्ड में भूस्खलन की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है जो राज्य के संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्रों में चिंता का विषय बन गई है, यह जानकारी वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के नए अध्ययन में सामने आई है, अध्ययन में भूस्खलन के कारणों, चट्टानों के प्रकार, ढलान, मौसम और भू-भौतिकीय अन्य पहलुओं का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश जानलेवा भूस्खलन मेन सेंट्रल थ्रस्ट के आसपास के क्षेत्रों में हुए हैं, जो भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील माने जाते हैं। वैज्ञानिक संदीप के अनुसार, यहां छोटे-छोटे भूकंप भी आते हैं, जो चट्टानों को कमजोर करते हैं और उनके जोड़ों के बीच पकड़ को ढीला कर देते हैं। इसके बाद जब बारिश होती है, तो पानी चट्टानों में प्रवेश कर उनकी टूटने की घटना को बढ़ाता है।

अध्ययन में यह भी बताया गया कि हल्के भूस्खलन मुख्य रूप से 24 घंटे से कम समय तक चलने वाली बारिश के दौरान होते हैं, जबकि बड़े भूस्खलन 48 से 72 घंटे तक लगातार बारिश होने पर ज्यादा होते हैं। ये भूस्खलन बारिश के पैटर्न में बदलाव और बढ़ते भू-जल स्तर से भी प्रभावित होते हैं।

Uttarakhand Landslides- विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2000 के बाद लगभग 67 जानलेवा भूस्खलन और 84 प्रतिशत अत्यधिक वर्षा की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें सबसे ज्यादा 52 घटनाएं मानसून (जून से सितंबर) के दौरान हुईं। वर्ष 2017 में पांच सबसे घातक भूस्खलन दर्ज किए गए।

चट्टानों के प्रकार के अनुसार, सबसे अधिक घटनाएं नीस (19) और क्वार्टजाइट (14) वाले पहाड़ों में हुईं। इसके अलावा, लाइमस्टोन वाले क्षेत्रों में भी भूस्खलन देखे गए। इस अध्ययन में वैज्ञानिक यशपाल सुंदरियाल, अनिरुद्ध चौहान और समीक्षा कौशिक शामिल रहे। शोध पत्र हाल ही में इंडियन अकादमी ऑफ साइंस के जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में प्रकाशित हुआ।

इतिहास में भी राज्य में कई जानलेवा भूस्खलन दर्ज हैं। 18 अगस्त 1998 को पिथौरागढ़ जिले के मालपा में 210 लोगों की मृत्यु हुई थी। 1880 में नैनीताल में 151, अगस्त 1951 में रुद्रप्रयाग जिले के शिवनंदी गांव में 100 और जुलाई 1990 में नीलकंठ क्षेत्र में भी 100 लोगों की जान गई थी। अगस्त 1998 में मद्महेश्वर घाटी में 103 लोग भूस्खलन की चपेट में आए।

Uttarakhand Landslides- अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उत्तराखंड में भूस्खलन की घटनाओं को नियंत्रित करने और सुरक्षा उपायों को बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है।

The7news
Author: The7news

और पढ़ें