Pirul Uttarakhand- उत्तराखंड में जंगलों की आग और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के लिए पिरुल (चीड़ की पत्तियां) अब महज ज्वलनशील अपशिष्ट नहीं बल्कि हरित अर्थव्यवस्था का नया आधार बन गया है। राज्य सरकार ने पिरुल से ब्रिकेट्स-पैलेट्स (कोयले की ईंट-गुटिका) बनाने की इकाइयों की स्थापना पर विशेष जोर दिया है, ताकि जंगलों में आग के जोखिम को कम किया जा सके और स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकें।
उत्तराखंड में 71.05 प्रतिशत वन क्षेत्र है, जिसमें 15.9 प्रतिशत चीड़ के जंगल हैं। अनुमानित रूप से प्रतिवर्ष 23 लाख मीट्रिक टन पिरुल गिरता है, जो ग्रीष्मकाल में जंगलों में आग फैलाने का प्रमुख कारण बनता है। इसके अलावा, पिरुल की मोटी परत जमीन में पानी समाने से रोकती है, जिससे अन्य वनस्पतियों का विकास भी प्रभावित होता है।
Pirul Uttarakhand- इस चुनौती का समाधान करने के लिए पिरुल को संसाधन के रूप में उपयोग में लाने की पहल शुरू की गई है। इसे एकत्र करने में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। पिरुल एकत्र करने वाले समूहों और संस्थाओं से इसे 10 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा जा रहा है और ब्रिकेट्स-पैलेट्स बनाने के लिए संबंधित इकाइयों को उपलब्ध कराया जा रहा है।
मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन सुशांत पटनायक ने बताया कि राज्य में पिरुल की दृष्टि से 57 संवेदनशील रेंज हैं। अब तक नौ रेंज में ब्रिकेट-पैलेट्स की इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं, और जल्द ही शेष रेंज में भी इनकी स्थापना की जाएगी। वर्तमान में नौ इकाइयां काम कर रही हैं, जिनमें अल्मोड़ा में 3, उत्तरकाशी में 2, नैनीताल, गढ़वाल, मसूरी और चंपावत में एक-एक इकाई है।
Pirul Uttarakhand- चार वर्षों में एकत्रित पिरुल की मात्रा भी बढ़ती जा रही है: 2022 में 1260 टन, 2023 में 2381.5 टन, 2024 में 3829.95 टन और 2025 में 5532.11 टन। इस पहल से न केवल जंगलों में आग का खतरा कम होगा, बल्कि पिरुल से बने ब्रिकेट्स-पैलेट्स के ईंधन के रूप में बाजार भी उपलब्ध है। इस तरह यह योजना उत्तराखंड के लिए पर्यावरण संरक्षण और हरित रोजगार का आदर्श उदाहरण बन रही है।
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